क्या आरक्षण, SC ST ACT और UGC Regulations की आग भाजपा को सत्ता से बाहर कर देगी?
भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक से भारतीय जनता पार्टी की जो सबसे बड़ी ताकत मानी जाती रही है, वह है उसका एकमुश्त और वफादार सवर्ण वोट बैंक। यह वह वर्ग है जिसने 2014 और 2019 में बिना किसी शर्त के, बिना किसी जातिगत सौदेबाजी के, केवल राष्ट्रवाद और सुशासन के नाम पर भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया। लेकिन आज वही सवर्ण समाज खुद को सबसे ज्यादा ठगा हुआ और अपमानित महसूस कर रहा है। सवाल अब यह नहीं है कि सवर्ण नाराज है या नहीं, सवाल यह है कि क्या सवर्णों की यही नाराजगी, जो आरक्षण, SC ST ACT और अब नए UGC Regulations के रूप में भड़की है, भाजपा को सत्ता से बाहर करने वाली आग बन चुकी है?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए हमें जमीनी हकीकत को देखना होगा, न कि टीवी चैनलों के प्रायोजित सर्वे को।
सवर्ण – भाजपा का आधार और उसकी अनदेखी
1999 के NSS सर्वे के अनुसार देश में सवर्णों की आबादी लगभग 40 प्रतिशत थी। पिछले 25 वर्षों में जनसंख्या वृद्धि के साथ यह आंकड़ा आज और भी बड़ा हो चुका है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे निर्णायक राज्यों में सवर्ण मतदाता ही हार-जीत तय करता है। भाजपा ने इस बात को अच्छी तरह समझा और इसी वर्ग के दम पर वह सत्ता के शिखर तक पहुंची।
लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा ने उसी वर्ग के खिलाफ सबसे कठोर फैसले लेने शुरू कर दिए। सवर्ण समाज ने कभी भाजपा से अपने लिए आरक्षण नहीं मांगा, उसने सिर्फ समानता और न्याय मांगा। उसकी तीन स्पष्ट मांगें वर्षों से लंबित हैं:
- जातिगत आधार पर दिए जा रहे असंवैधानिक आरक्षण की समीक्षा और उसे समाप्त करना।
- SC ST ACT जैसे काले कानून में सुधार, जो बिना जांच के गिरफ्तारी और बिना अपराध के सजा का हथियार बन चुका है।
- शिक्षा और नौकरियों में मेरिट की हत्या करने वाले UGC के नए भेदभावकारी Regulations को वापस लेना।
सवर्ण समाज पिछले कई वर्षों से शांतिपूर्ण तरीके से, ज्ञापनों के माध्यम से, सोशल मीडिया और धरनों के माध्यम से इन मांगों को उठा रहा है। लेकिन सरकार ने न सिर्फ इन मांगों को अनसुना किया, बल्कि हर बार सवर्णों के घाव पर नमक छिड़कने का काम किया है।
आरक्षण – असंवैधानिक व्यवस्था जो देश को बांट रही है
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को 10 वर्षों के लिए एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में बनाया था, ताकि समाज के वंचित वर्ग को मुख्यधारा में लाया जा सके। लेकिन आज 75 साल बाद भी इसे वोट बैंक का स्थायी हथियार बना दिया गया है। 50 प्रतिशत की लक्ष्मण रेखा को तोड़कर 60, 70 और अब कई राज्यों में 80 प्रतिशत तक आरक्षण पहुंचा दिया गया है।
इसका सीधा खामियाजा सवर्ण युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। 95 प्रतिशत नंबर लाने वाला सवर्ण छात्र एडमिशन से वंचित रह जाता है और 40 प्रतिशत नंबर वाला छात्र उसी सीट पर कब्जा कर लेता है। यह प्रतिभा का अपमान नहीं तो और क्या है? क्या यही सामाजिक न्याय है? सवर्ण समाज अब समझ चुका है कि यह आरक्षण गरीबी हटाने का नहीं, बल्कि सवर्णों को उनके ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का षड्यंत्र है। भाजपा, जिसने कभी मेरिट और समानता की बात की थी, आज सबसे बड़ी आरक्षण समर्थक पार्टी बन चुकी है।
SC ST ACT – डर और दमन का कानून
2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने SC ST ACT में बिना जांच गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी, तो पूरे सवर्ण समाज ने उसका स्वागत किया था। उसे लगा था कि अब निर्दोष लोगों को फंसाया नहीं जाएगा। लेकिन भाजपा सरकार ने उसी रात अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया और इस कानून को पहले से भी ज्यादा कठोर बना दिया।
आज स्थिति यह है कि इस कानून के 99 प्रतिशत से ज्यादा मामले फर्जी पाए जाते हैं, यह खुद सरकारी आंकड़े कहते हैं। एक झूठी शिकायत पर किसी भी सवर्ण व्यक्ति को, उसके पूरे परिवार को जेल में डाल दिया जाता है, उसकी जमानत तक नहीं होती। कितने सवर्णों ने इस अपमान से तंग आकर आत्महत्या कर ली, इसका कोई हिसाब नहीं। भाजपा ने इस कानून को सवर्णों के गले में फंदे की तरह डाल दिया है। सवर्ण समाज पूछ रहा है कि क्या भाजपा को सिर्फ SC ST वोट चाहिए, सवर्णों का वोट नहीं चाहिए?
UGC Regulations – आखिरी कील
रही-सही कसर नए UGC Regulations ने पूरी कर दी है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नियुक्तियों और पदोन्नतियों में जिस तरह से जातिगत भेदभाव को संस्थागत किया जा रहा है, उसने सवर्ण शिक्षकों और छात्रों के भविष्य पर पूर्ण विराम लगा दिया है। मेरिट को पूरी तरह से खत्म करके केवल जाति को ही योग्यता बना दिया गया है।
सवर्ण समाज, जो हमेशा शिक्षा और ज्ञान को सर्वोपरि मानता रहा है, वह इस Regulation को अपने अस्तित्व पर हमला मान रहा है।
2024 और उसके बाद – सवर्णों का निर्णायक फैसला
भाजपा की सबसे बड़ी भूल यह रही कि उसने सवर्णों को बंधुआ वोटर समझ लिया। उसे लगा कि सवर्णों के पास कोई विकल्प नहीं है, वे डर से या हिंदुत्व के नाम पर अंततः भाजपा को ही वोट देंगे। लेकिन अब यह भ्रम टूट चुका है।
आज गांव-गांव, शहर-शहर में सवर्ण युवा खुलकर कह रहा है – “हम भाजपा को वोट नहीं देंगे।” व्हाट्सएप ग्रुप, ब्राह्मण महासभाएं, क्षत्रिय महासभाएं, कायस्थ सम्मेलन, वैश्य सम्मेलन – हर जगह एक ही संकल्प लिया जा रहा है। लगभग सभी सवर्णों ने भाजपा की सवर्ण विरोधी नीतियों के चलते भाजपा को वोट न देने का फैसला कर लिया है।
यह कोई भावनात्मक फैसला नहीं है, यह अस्तित्व बचाने का फैसला है। जब सरकार किसी भी मांग पर विचार करने के लिए भी तैयार नहीं है, तो लोकतंत्र में सवर्णों के पास एक ही हथियार बचता है – वोट का हथियार।
यदि सवर्ण समाज, जो 1999 में 40 प्रतिशत था और आज और भी अधिक है, एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ वोट करता है, तो कोई भी चुनावी गणित भाजपा को बचा नहीं सकता। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से कम से कम 50 सीटों पर, बिहार की 40 में से 25 सीटों पर, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में सवर्ण निर्णायक भूमिका में है। 5-7 प्रतिशत वोट का इधर-उधर होना भी सत्ता पलट देता है, यहां तो बात 30-35 प्रतिशत एकमुश्त वोट के खिसकने की हो रही है।
इसलिए नतीजा स्पष्ट है। आरक्षण, SC ST ACT और UGC Regulations की जो आग भाजपा ने खुद अपने सबसे वफादार वोट बैंक के सीने में लगाई है, वही आग अब भाजपा को सत्ता से बाहर करने जा रही है। सवर्ण समाज अब जाग चुका है, वह संगठित हो रहा है और वह आने वाले हर चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए तैयार बैठा है।
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